उत्तराखंड

चिपको आंदोलन विशेष… जंगल बचाने के लिए दुनिया का सबसे अनूठा आंदोलन

देहरादून: चिपको आंदोलन एक ऐसा आंदोलन जिसने केवल भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में अपना असर दिखाया। यह आंदोलन पर्यावरण संरक्षण का सबसे बड़ा उदाहरण बन गया। गौरा देवी ने पेड़ों को बचाने के लिए जो कदम उठाए, उसका असर आज भी कई जगहों पर विभिन्न रूपों में नजर आता है।

आज से ठीक 49 साल पहले चमोली जिले के रैणी गांव में वनों को कटने से बचाने के लिए अंग्वाल यानी चिपको आंदोलन शुरू हुआ था। रैणी गांव की गौरा देवी की अगुवाई में ग्रामीण महिलाओं ने पेड़ों पर चिपक कर पेड़ों को बचाने और पर्यावरण संरक्षण का अनोखा उदाहरण पेश किया था। इस आंदोलन का पहले कोई नाम नहीं था। महिलाओं की पेड़ों पर अंग्वाल के कारण इसका नाम चिपको आंदोलन पड़ा। क्यांकि अंग्वाल का मतलब किसी से चिपकना होता है।

कटते जंगलों को बचाने और लोगों को जल, जंगल, जमीन से जोड़ने के लिए शुरू हुआ यह आंदोलन चिपको के नाम से प्रसिद्ध हुआ। चिपको आंदोलन रैणी के जंगलों में 26 मार्च 1973 को हुआ था। आज भी रैणी गांव के ग्रामीणों में अपने जंगल को बचाने के लिए वहीं जुनून और जज्बा देखने को मिलता है। वर्ष 1970 के दशक में गढ़वाल के रामपुर-फाटा, मंडल घाटी के भोंस, पांडर बासा से लेकर जोशीमठ की नीती घाटी के रैणी गांव में हरे भरे जंगलों में लाखों पेड़ों को काटने की अनुमति शासन और सरकार की ओर से दी गई तो इस फरमान ने पहाड़ के गांवों को झकझोर कर रख दिया था। एक अप्रैल 1973 का दिन चिपको आंदोलन का स्वर्णिम तिथियों में एक है।

इसी दिन गोपेश्वर स्थित सर्वाेदय केंद्र से भौंस-मंडल के जंगल के अंगू के पेड़ों को कटने से बचाने के लिए चिपको अंग्वाल्टा शब्द आंदोलनकारियों के बीच आया था और उसी दिन मंडल के जंगल में अंगू के पेड़ों के कटान के लिए पहुंची साइमंड एंड कंपनी से पेड़ों को बचाने के लिए पेड़ों पर चिपकने की योजना बनाई गई। चिपको आंदोलन की रणनीति बनी और मंडल घाटी के गौंडी में 25 अप्रैल को आलम सिंह बिष्ट की अध्यक्षता में पूरे इलाके के लोगों की बैठक हुई, जिसके बाद चिपको आंदोलन फाटा और फिर रैणी गांव से होते हुए पूरे देश में फैल गया।

26 मार्च 1973 को साइमन एंड कमीशन के मजदूर रैणी गांव में अंगू और चमखड़ीक के करीब 2500 पेड़ों के कटान के लिए पहुंचे। संयोगवश इसी दिन गांव के पुरुष भूमि के मुआवजे के लिए चमोली तहसील गए हुए थे। सुबह नौ बजे साइमन कमीशन के मजदूरों ने आरी और कुल्हाड़ी लेकर जैसे ही रैणी गांव के जंगल पर धावा बोला तो महिलाएं हो-हल्ला करने लगीं, लेकिन कुछ नहीं हुआ।

बाद में गौरा देवी के नेतृत्व में क्षेत्र की महिलाओं ने जंगल जाकर ठेकेदारों और मजदूरों का डटकर विरोध किया। कई घंटों तक संघर्ष होता रहा। महिलाओं ने कहा कि यह जंगल हमारा मायका है। हमारी जान चली जाए, पर हम इन्हें कटने नहीं देंगे। इसके बाद भी जब पेड़ों का कटान शुरू हुआ तो गौरा देवी के एक इशारे पर महिलाएं पेड़ों से चिपक गईं। महिलाओं ने कहा कि पेड़ों के कटने से पहले हम स्वयं कट जाएंगी। जंगल में महिलाओं के उग्र विरोध के पश्चात ठेकेदारों ने हथियार डाल दिए और जंगल से बैरंग लौट गए।

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