दिव्यांगता हैंडबुक: उत्तराखंड में समावेशी नीति-निर्माण को मिलेगा बल

देहरादून । विधायी कार्यों में दिव्यांगता समावेशन को बढ़ावा देने के लिए सांसदों के लिए विशेष रूप से तैयार भारत की पहली हैंडबुक का हाल ही में केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास आठवले ने विमोचन किया। नेशनल सेंटर फॉर प्रमोशन ऑफ एम्प्लॉयमेंट फॉर डिसएबल्ड पीपल (एनसीपीईडीपी) द्वारा बजाज फिनसर्व सीएसआर के सहयोग से तैयार ‘बियॉन्ड द विज़िबल’ कानून निर्माताओं को दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 को जमीनी स्तर पर प्रभावी बनाने के लिए व्यावहारिक मार्गदर्शन प्रदान करती है।
यह प्रकाशन उत्तराखंड जैसे राज्य के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक है, जहाँ दिव्यांगजनों की उल्लेखनीय संख्या है और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियाँ व दूरस्थ क्षेत्र अतिरिक्त चुनौतियाँ प्रस्तुत करते हैं। यह ऐसे समय में सामने आया है, जब देश 2027 की जनगणना की तैयारी कर रहा है, जो आरपीडब्ल्यूडी अधिनियम के बाद पहली राष्ट्रीय कवायद होगी और 21 प्रकार की दिव्यांगताओं को सटीक व पृथक आंकड़ों के साथ पहचानने का अवसर प्रदान करेगी। यह हैंडबुक पहली बार “राजनीतिक बाधाओं” को बहिष्करण के एक प्रमुख रूप के रूप में मान्यता देती है और सांसदों को संसद में प्रभावी ढंग से मुद्दे उठाने के व्यावहारिक उपकरण प्रदान करती है।
एनसीपीईडीपी के कार्यकारी निदेशक अरमान अली ने कहा, “यह हैंडबुक सांसदों और नागरिक समाज दोनों को औपचारिकता से आगे बढ़कर शासन और जमीनी स्तर पर दिव्यांगता समावेशन को केंद्र में लाने के लिए सशक्त बनाती है।”
हैंडबुक देशभर में दिव्यांगजनों की उस वास्तविकता की ओर भी ध्यान आकर्षित करती है, जिसमें 80 प्रतिशत से अधिक लोग अब भी स्वास्थ्य बीमा से वंचित हैं। इसका प्रमुख कारण उच्च प्रीमियम और दिव्यांगता-विशिष्ट जरूरतों का कवरेज में अभाव है। इसमें आयुष्मान भारत जैसी प्रमुख योजनाओं को सहायक उपकरणों और पुनर्वास सेवाओं सहित व्यापक कवरेज के साथ अधिक समावेशी बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। साथ ही, यह दस्तावेज़ दिव्यांगता क्षेत्र में कार्यरत गैर-सरकारी संगठनों के लिए लक्षित वकालत अभियानों की योजना बनाने और राज्य व निर्वाचन क्षेत्र स्तर पर प्रगति की निगरानी में भी उपयोगी साबित होगा।
यह संसाधन प्रमुख अवधारणाओं, कानूनी ढांचे, बजट रुझानों, संसदीय दायित्वों और सफल मॉडलों को समाहित करता है, साथ ही सुलभता, प्रतिनिधित्व और बजटीय समर्थन पर अधिक ध्यान देने का आह्वान करता है—जो पहाड़ी राज्यों जैसे उत्तराखंड में विशेष महत्व रखते हैं। इस हैंडबुक का विमोचन दिव्यांगजन अधिकारों पर राष्ट्रीय विमर्श को और सुदृढ़ करने तथा समावेशी और विकसित भारत के निर्माण के साझा लक्ष्य को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान देने की उम्मीद है, जहाँ हर क्षेत्र और हर नागरिक को समान अवसर मिले।



